मित्रता दिवस 2026 के अवसर पर देश उन महान क्रांतिकारियों को भी याद कर रहा है, जिन्होंने दोस्ती का अर्थ केवल साथ निभाना नहीं, बल्कि देश के लिए एक साथ बलिदान देना भी साबित किया। शहीद भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की मित्रता आज भी युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
भारत की आजादी की लड़ाई में इन तीनों क्रांतिकारियों ने एक-दूसरे का हर परिस्थिति में साथ दिया। जेल से लेकर फांसी के तख्ते तक उनकी अटूट मित्रता ने इतिहास में ऐसी मिसाल कायम की, जिसे आज भी सम्मान के साथ याद किया जाता है।
भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की दोस्ती
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भगत सिंह, शिवराम हरि राजगुरु और सुखदेव थापर की तिकड़ी सबसे चर्चित क्रांतिकारी साथियों में गिनी जाती है। तीनों का उद्देश्य एक ही था—भारत को अंग्रेजी शासन से आजाद कराना।
इनकी मित्रता केवल व्यक्तिगत संबंध तक सीमित नहीं थी, बल्कि देशभक्ति, साहस और त्याग के साझा संकल्प पर आधारित थी। यही कारण था कि उन्होंने हर कठिन परिस्थिति में एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ा।
सुखदेव और भगत सिंह की पहली मुलाकात
भगत सिंह और सुखदेव की मुलाकात लाहौर के नेशनल कॉलेज में हुई थी। समान विचारधारा और देशभक्ति के कारण दोनों जल्द ही घनिष्ठ मित्र बन गए। बाद में दोनों हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) और नौजवान भारत सभा से जुड़े।
राजगुरु भी इसी क्रांतिकारी संगठन का हिस्सा बने और तीनों ने मिलकर अंग्रेजी शासन के खिलाफ कई महत्वपूर्ण योजनाओं में भाग लिया।
जेल में भी निभाई मित्रता
भगत सिंह ने जेल में भारतीय कैदियों के साथ हो रहे भेदभाव और खराब भोजन के विरोध में लंबा अनशन किया था। उनका उद्देश्य केवल अपने लिए नहीं, बल्कि सभी भारतीय कैदियों के अधिकारों की रक्षा करना था।
इस आंदोलन ने अंग्रेजी शासन पर दबाव बनाया और जेल में भारतीय कैदियों की सुविधाओं को लेकर चर्चा तेज हुई।
लाहौर षड्यंत्र केस और गिरफ्तारी
साल 1928 में लाला लाजपत राय की मृत्यु के बाद क्रांतिकारियों ने बदला लेने की योजना बनाई। इस दौरान जॉन सॉन्डर्स की गोली मारकर हत्या कर दी गई। बाद में इस मामले में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को लाहौर षड्यंत्र केस में आरोपी बनाया गया।
तीनों ने मुकदमे का सामना किया और अंततः उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई।
घटना का संक्षिप्त विवरण
विवरण. जानकारी
प्रमुख क्रांतिकारी. भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु
मामला. लाहौर षड्यंत्र केस
फांसी की तिथि. 23 मार्च 1931
स्थान. लाहौर सेंट्रल जेल
उद्देश्य. भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष
फांसी से पहले दोस्ती की अंतिम मिसाल
प्रचलित ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, फांसी से पहले जब अंतिम इच्छा पूछी गई तो तीनों ने एक-दूसरे से गले मिलने की इच्छा जताई। अनुमति मिलने के बाद उन्होंने एक-दूसरे को गले लगाया और हंसते हुए देश के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।
23 मार्च 1931 को तीनों क्रांतिकारियों को लाहौर सेंट्रल जेल में फांसी दी गई। उनका बलिदान भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में हमेशा याद रखा जाएगा।
मित्रता दिवस 2026 पर क्यों याद किए जाते हैं ये तीनों?
मित्रता दिवस 2026 केवल दोस्तों के साथ समय बिताने का अवसर नहीं है, बल्कि उन महान मित्रों को याद करने का भी दिन है जिन्होंने दोस्ती, विश्वास और देशभक्ति की सर्वोच्च मिसाल पेश की।
भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की मित्रता बताती है कि सच्चा मित्र वही होता है जो हर कठिन परिस्थिति में साथ खड़ा रहे और अपने सिद्धांतों के लिए अंतिम क्षण तक अडिग रहे।
आज भी इन तीनों शहीदों का जीवन युवाओं को देशप्रेम, साहस और निस्वार्थ मित्रता का संदेश देता है। मित्रता दिवस 2026 पर उनका बलिदान और अटूट साथ नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है।







